राम जी ने शबरी के खाए झूठे बेर भजन लिरिक्स
राम जी ने शबरी के खाए झूठे बेर भजन लिरिक्स
भाव के हैं भूखे भगवन
सुने सब की टेर
राम जी ने
शबरी के खाए झूठे बेर।
भाव में बंधे ना होते
झोपड़ियां ना जाते
झोपड़ियां ना जाते ईश्वर
दरश ना दिखाते
बेर तो जरूरी है
नहीं अंधेर
राम जीं ने
शबरी के खाए झूठे बेर।
राह निहारे शबरी
दरस कब मिलेंगे
दरस कब मिलेंगे ईश्वर
दरस कब मिलेंगे
दौड़े जाते ईश्वर देखा
करते नहीं देर
राम जीं ने
शबरी के खाए झूठे बेर।
भाव के हैं भूखे भगवन
सुने सब की टेर
राम जी ने
शबरी के खाए झूठे बेर।
FAQ
प्रश्न 1: “भाव के हैं भूखे भगवन” भजन में किस प्रसंग का वर्णन है?
उत्तर: इस भजन में भगवान श्रीराम और भक्त शबरी के बीच प्रेम और भक्ति से जुड़े प्रसंग का वर्णन किया गया है।
प्रश्न 2: भगवान श्रीराम ने शबरी के बेर क्यों खाए?
उत्तर: भजन में बताया गया है कि भगवान श्रीराम ने शबरी के प्रेम और भक्ति के भाव को स्वीकार करते हुए उसके बेर खाए।
प्रश्न 3: शबरी भगवान श्रीराम की प्रतीक्षा क्यों कर रही थी?
उत्तर: शबरी भगवान श्रीराम के दर्शन की प्रतीक्षा कर रही थी और उनके आने की राह निहार रही थी।
प्रश्न 4: भजन का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: भजन का मुख्य संदेश है कि भगवान के लिए बाहरी दिखावे से अधिक सच्चा प्रेम, श्रद्धा और भक्ति का भाव महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 5: “भाव के हैं भूखे भगवान” का क्या अर्थ है?
उत्तर: इसका अर्थ है कि भगवान अपने भक्त की सच्ची श्रद्धा और प्रेम को महत्व देते हैं। सच्चे भाव से की गई भक्ति उन्हें प्रिय होती है।
व्याख्या
“भाव के हैं भूखे भगवन” भजन भगवान श्रीराम और माता शबरी के प्रेमपूर्ण भक्ति-प्रसंग को प्रस्तुत करता है। इसमें बताया गया है कि भगवान अपने भक्त की सच्ची भावना और प्रेम को सबसे अधिक महत्व देते हैं।
शबरी भगवान श्रीराम के दर्शन की लंबे समय से प्रतीक्षा कर रही थी। वह उनकी राह निहारती रहती थी और विश्वास करती थी कि एक दिन प्रभु उसके पास अवश्य आएँगे। जब भगवान श्रीराम शबरी की कुटिया में पहुँचे, तो उन्होंने उसके प्रेम को स्वीकार किया।
भजन में शबरी द्वारा प्रेम से दिए गए बेरों का उल्लेख है। भगवान श्रीराम ने शबरी के प्रेम और भक्ति को देखकर उन बेरों को स्वीकार किया। यह प्रसंग बताता है कि भक्ति में वस्तु का मूल्य नहीं, बल्कि भक्त के भाव का महत्व होता है।
इस भजन का मुख्य संदेश है कि भगवान सच्चे प्रेम और श्रद्धा से प्रसन्न होते हैं। यदि भक्त के हृदय में निर्मल भाव हो, तो भगवान उसके प्रेम को स्वीकार करते हैं।