राम गुण गायो नहीं आय करके यम से कहोगे क्या जाय करके भजन लिरिक्स
राम गुण गायो नहीं आय करके यम से कहोगे क्या जाय करके
राम गुण गायो नहीं आय करके
यम से कहोगे क्या जाय करके
गर्भ में देखी नरक निशानी
तब तू कौल किया था प्राणी
भजन करूँगा चित्त लाय करके
यम से कहोगे क्या जाय करके
बालपने में लाड़ लड़ायो
मात पिता तने पालने झुलायो
समय गमायो खेल खाय करके
यम से कहोगे क्या जाय करके
तरुण भयो तिरिया संग राच्यो
नट मरकट ज्यों निशदिन नाच्यो
माया में रह्यो रे भरमाय करके
यम से कहोगे क्या जाय करके
जीवन बीत बुढ़ापो आवे
इंद्री सब शीतल होय जावे
तब रोवोगे पछताय करके
यम से कहोगे क्या जाय करके
वेद पूरान संत यो गावै
बार बार नर देही ना पावै
देवकी तिरोगे हरि गाय करके
यम से कहोगे क्या जाय करके
राम गुण गायो नहीं आय करके
यम से कहोगे क्या जाय करके
FAQ
प्रश्न 1: इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: इस भजन का मुख्य संदेश है कि मनुष्य को जीवन रहते भगवान श्रीराम का नाम और गुणगान करना चाहिए तथा समय को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।
प्रश्न 2: भजन में यम से क्या कहने की बात कही गई है?
उत्तर: भजन में चेतावनी दी गई है कि यदि जीवन में राम नाम का स्मरण नहीं किया, तो मृत्यु के समय यम के सामने पछताने से कोई लाभ नहीं होगा।
प्रश्न 3: मनुष्य गर्भ में क्या संकल्प करता है?
उत्तर: भजन के अनुसार गर्भ में कष्ट और नरक जैसी स्थिति देखकर मनुष्य भगवान का भजन करने का संकल्प करता है, लेकिन जन्म लेने के बाद उस संकल्प को भूल जाता है।
प्रश्न 4: युवावस्था में मनुष्य किसमें उलझ जाता है?
उत्तर: भजन के अनुसार युवावस्था में मनुष्य सांसारिक आकर्षण, स्त्री-संग और माया-मोह में उलझकर अपना समय व्यर्थ कर देता है।
प्रश्न 5: बुढ़ापे में क्या पछतावा होता है?
उत्तर: बुढ़ापे में जब शरीर और इंद्रियाँ कमजोर हो जाती हैं, तब मनुष्य अपने बीते हुए समय को याद करके पछताता है कि उसने भगवान का भजन क्यों नहीं किया।
व्याख्या
यह भजन मनुष्य को जीवन की नश्वरता और समय के सदुपयोग का संदेश देता है। इसमें मनुष्य को चेतावनी दी गई है कि केवल सांसारिक सुखों और मोह-माया में अपना जीवन व्यर्थ नहीं करना चाहिए, बल्कि समय रहते भगवान श्रीराम का नाम और गुणगान करना चाहिए।
भजन में गर्भावस्था का उदाहरण देकर बताया गया है कि मनुष्य गर्भ में भगवान से भजन करने का संकल्प करता है, लेकिन जन्म के बाद बाल्यावस्था के खेल-कूद, युवावस्था के मोह और संसार की माया में वह अपने संकल्प को भूल जाता है।
जब जीवन का अधिकांश समय बीत जाता है और बुढ़ापा आ जाता है, तब शरीर की इंद्रियाँ कमजोर हो जाती हैं। उस समय मनुष्य पछताता है, लेकिन बीता हुआ समय वापस नहीं आता।
अंत में वेद, पुराण और संतों की वाणी का स्मरण कराते हुए कहा गया है कि मनुष्य को यह दुर्लभ मानव जन्म बार-बार नहीं मिलता। इसलिए जीवन रहते भगवान श्रीराम का नाम लेना और उनके गुणों का गान करना ही जीवन को सार्थक बनाने का श्रेष्ठ मार्ग है।