वह राम भक्त तुलसी ब्रजधाम जा रहा है भजन लिरिक्स
वह राम भक्त तुलसी ब्रजधाम जा रहा है भजन लिरिक्स
वह राम भक्त तुलसी
ब्रजधाम जा रहा है
दोहा
राम श्याम दोउ एक है
नहिं कछु अन्तर शेष
उनके नयन गंभीर है
इनके चपल विशेष
वृन्दावन के वृक्ष को
मरम न जाने कोय
डाल डाल और पात पात पे
राधे राधे होय
वह राम भक्त तुलसी
ब्रजधाम जा रहा है
जहाँ राधे राधे राधे
हर कोई गा रहा है।
धुन राधे राधे मानो
पत्तों से आ रही है
कण कण से आ रही है
जन जन से आ रही है
क्या दिव्य कीर्तन है
क्या दिव्य कीर्तन है
आनन्द आ रहा है
जहाँ राधे राधे राधे
हर कोई गा रहा है।
गोविन्द को तुलसी ने
माथा झुका दिया क्या
बोला पुजारी हस के
पाला बदल लिया क्या
भक्ति में बल है कितना
भक्ति में बल है कितना
तुलसी बता रहा है
जहाँ राधे राधे राधे
हर कोई गा रहा है।
दोहा
मैं क्या कहूँ छवि आप की
तुम भले बने हो नाथ
तुलसी मस्तक तभी नवे
जब धनुष बाण हो हाथ।
गोविन्द कृष्ण देखो
अब राम बन गए है
उनको प्रणाम करके
तुलसी जी कह रहे है
मेरा राम ही यहाँ पर
मेरा राम ही यहाँ पर
मुरली बजा रहा है
जहाँ राधे राधे राधे
हर कोई गा रहा है।
वह रामभक्त तुलसी
ब्रजधाम जा रहा है
जहाँ राधे राधे राधे
हर कोई गा रहा है।
FAQ
प्रश्न 1: “वह राम भक्त तुलसी ब्रजधाम जा रहा है” भजन में किसका वर्णन है?
उत्तर: इस भजन में तुलसीदास जी की रामभक्ति और ब्रजधाम में भगवान कृष्ण के प्रति उनकी भक्ति-भावना का वर्णन किया गया है।
प्रश्न 2: भजन के दोहे में राम और श्याम के बारे में क्या कहा गया है?
उत्तर: दोहे में कहा गया है कि राम और श्याम दोनों एक ही परम सत्ता के रूप हैं और उनमें कोई वास्तविक अंतर नहीं है।
प्रश्न 3: वृन्दावन के वृक्षों के बारे में क्या कहा गया है?
उत्तर: भजन में कहा गया है कि वृन्दावन के वृक्षों की महिमा को कोई पूरी तरह नहीं जान सकता और वहाँ डाल-डाल तथा पात-पात पर “राधे-राधे” का भाव व्याप्त है।
प्रश्न 4: तुलसीदास जी ने गोविन्द कृष्ण को प्रणाम क्यों किया?
उत्तर: भजन के भाव के अनुसार तुलसीदास जी भगवान कृष्ण में भी अपने आराध्य श्रीराम का ही स्वरूप देखते हैं और इसी भाव से उन्हें प्रणाम करते हैं।
प्रश्न 5: “मेरा राम ही यहाँ पर मुरली बजा रहा है” का क्या भाव है?
उत्तर: इसका भाव यह है कि तुलसीदास जी को भगवान कृष्ण के रूप में भी अपने प्रिय भगवान श्रीराम का ही दर्शन होता है।
व्याख्या
“वह राम भक्त तुलसी ब्रजधाम जा रहा है” भजन भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त तुलसीदास जी की उस भक्ति-भावना को प्रस्तुत करता है, जिसमें उन्हें श्रीकृष्ण के ब्रज रूप में भी अपने आराध्य श्रीराम के दर्शन होते हैं।
भजन के दोहे में राम और श्याम को एक ही परम तत्व के दो रूप बताया गया है। वृन्दावन की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वहाँ के कण-कण और वृक्षों के पत्ते-पत्ते में “राधे-राधे” का नाम गूँजता है।
जब तुलसीदास जी ब्रजधाम पहुँचते हैं और भगवान गोविन्द के दर्शन करते हैं, तो उनके सामने भक्ति का एक सुंदर भाव प्रकट होता है। भजन में यह भाव रखा गया है कि सच्ची भक्ति में भगवान के विभिन्न रूपों के बीच भेद नहीं रहता।
दोहा “तुलसी मस्तक तभी नवे, जब धनुष बाण हो हाथ” तुलसीदास जी की श्रीराम के प्रति अनन्य भक्ति को दर्शाता है। लेकिन आगे वे कृष्ण में भी उसी राम का दर्शन करते हैं। इसलिए उनके लिए मुरली बजाने वाले कृष्ण भी उनके अपने राम ही हैं।
इस भजन का मुख्य संदेश ईश्वर की एकता, सच्ची भक्ति और भगवान के विभिन्न रूपों में एक ही परम सत्ता का दर्शन करना है।