हे राम अवध के राजा तुझे कौन सी दुविधा घेरे भजन लिरिक्स
हे राम अवध के राजा तुझे कौन सी दुविधा घेरे
हे राम अवध के राजा
तुझे कौन सी दुविधा घेरे
जन-जन के भाग्य विधाता
क्या लिखा भाग्य में तेरे।
क्या पूछ रहे हैं तुझसे
इन महलों के सन्नाटे
वो कौन सा दुख तू जिसको
सीता से भी ना बाँटे।
मर्यादाओं की बेड़ी
वचनों के भीषण ताले
पुरखों के सम्मुख तूने
स्वयमेव स्वयं पर डाले।
रघुकुल के संचित यश का
अब तू ही उत्तरदायी
उस राह तुझे भी चलना
पुरखों ने जो राह बनाई।
जो तुझको समझ न पाए
सचमुच वे लोग अभागे
तू रख दे अपनी पीड़ा
अपने आराध्य के आगे।
शिव जी की तरह तुझको भी
जीवन विष पीना होगा
इन विषम परिस्थितियों से
लड़-लड़ कर जीना होगा।
हे राम अवध के राजा
तुझे कौन सी दुविधा घेरे
जन-जन के भाग्य विधाता
क्या लिखा भाग्य में तेरे।
FAQ
प्रश्न 1: “हे राम अवध के राजा” भजन में किसका वर्णन किया गया है?
उत्तर: इस भजन में भगवान श्रीराम के जीवन, उनकी मर्यादा, त्याग और कठिन परिस्थितियों का भावपूर्ण वर्णन किया गया है।
प्रश्न 2: भजन में भगवान श्रीराम को “जन-जन के भाग्य विधाता” क्यों कहा गया है?
उत्तर: भगवान श्रीराम को जन-जन के कल्याण और भाग्य का विधाता मानते हुए यह संबोधन किया गया है।
प्रश्न 3: राम की दुविधा का मुख्य कारण क्या बताया गया है?
उत्तर: भजन में राम की दुविधा को उनकी मर्यादा, दिए हुए वचन और रघुकुल की परंपराओं से जुड़ा बताया गया है।
प्रश्न 4: भगवान श्रीराम ने अपनी पीड़ा किसके सामने रखने की बात कही गई है?
उत्तर: भजन में कहा गया है कि श्रीराम अपनी पीड़ा अपने आराध्य भगवान शिव के सामने रख सकते हैं।
प्रश्न 5: भजन में भगवान शिव का उदाहरण क्यों दिया गया है?
उत्तर: भगवान शिव की तरह श्रीराम को भी जीवन की कठिन परिस्थितियों और दुखों को सहन करते हुए अपने कर्तव्य के मार्ग पर चलने का भाव व्यक्त किया गया है।
व्याख्या
“हे राम अवध के राजा” एक भावपूर्ण भजन है, जिसमें भगवान श्रीराम के जीवन में आने वाली कठिनाइयों, उनके त्याग और मर्यादा का वर्णन किया गया है। भजन में राम को अवध का राजा और जन-जन के भाग्य का विधाता कहकर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की गई है।
भजन में उनके मन की उस पीड़ा को समझने का प्रयास किया गया है जिसे वे अपने प्रियजनों से भी पूरी तरह साझा नहीं कर पाते। श्रीराम के जीवन में मर्यादा, वचन और रघुकुल की प्रतिष्ठा का विशेष महत्व बताया गया है।
रघुकुल की परंपराओं और पूर्वजों द्वारा बनाए गए मार्ग पर चलते हुए श्रीराम ने अपने व्यक्तिगत सुख से ऊपर अपने कर्तव्य और मर्यादा को रखा। इसी कारण भजन में उनके जीवन को त्याग और कठिन तपस्या के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
भजन में भगवान शिव का उदाहरण देकर कहा गया है कि जैसे शिव जी ने विष को धारण किया, उसी प्रकार श्रीराम को भी जीवन की विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए अपना जीवन जीना पड़ा। यह भजन हमें कर्तव्य, मर्यादा, त्याग, धैर्य और कठिन परिस्थितियों में भी अपने धर्म के मार्ग पर बने रहने की प्रेरणा देता है।