हे जननी मैं न जीऊं बिन राम भजन लिरिक्स
हे जननी मैं न जीऊं बिन राम भजन लिरिक्स
दोहा
राम ही तन में, राम ही मन में,
रोम-रोम में ही राम
राम बिना मोरा जीवन सूना
कैसे जियूँ बिन राम
हे जननी, मैं न जियूँ बिन राम
राम लखन सिया वन को गमन कीन्हो
पिता गए सुरधाम
जननी, मैं न जियूँ बिन राम
होत भोर हमहुँ बन जइबे
अवध आइहे केहि काम
कपट कुटिल कुबुद्धि अभागिनी
कौन हरायो तेरो ज्ञान
जननी, मैं न जियूँ बिन राम
सुर नर मुनि सब दोष देते हैं
नहीं कियो भल काम
तुलसीदास प्रभु आस चरण की
भए विधाता वाम
जननी, मैं न जियूँ बिन राम
हे जननी, मैं न जियूँ बिन राम
राम लखन सिया वन को गमन कीन्हो
पिता गए सुरधाम
जननी, मैं न जियूँ बिन राम
FAQ
प्रश्न 1: “हे जननी, मैं न जियूँ बिन राम” भजन में किसका भाव व्यक्त किया गया है?
उत्तर: इस भजन में भगवान श्रीराम के वनवास जाने से उत्पन्न गहरे दुख और राम के बिना जीवन को सूना मानने की भावना व्यक्त की गई है।
प्रश्न 2: दोहे में राम के बारे में क्या कहा गया है?
उत्तर: दोहे में कहा गया है कि राम तन में हैं, मन में हैं और रोम-रोम में बसे हुए हैं। राम के बिना जीवन सूना है।
प्रश्न 3: राम, लक्ष्मण और सीता कहाँ गए?
उत्तर: भजन के अनुसार राम, लक्ष्मण और सीता वन को चले गए तथा उनके पिता राजा दशरथ सुरधाम चले गए।
प्रश्न 4: भजन में “कपट कुटिल कुबुद्धि” किस संदर्भ में कहा गया है?
उत्तर: यह पंक्तियाँ उस घटना के संदर्भ में हैं जिसमें कैकेयी की कुटिल बुद्धि और उसके द्वारा माँगे गए वरदानों के कारण श्रीराम को वनवास जाना पड़ा।
प्रश्न 5: तुलसीदास जी ने अंत में क्या कहा है?
उत्तर: तुलसीदास जी भगवान श्रीराम के चरणों में अपनी आशा रखते हैं और कहते हैं कि विधाता उनके प्रतिकूल हो गए हैं।
व्याख्या
यह भजन भगवान श्रीराम के वनवास के प्रसंग से जुड़े अत्यंत मार्मिक भावों को प्रस्तुत करता है। इसमें राम के प्रति ऐसी गहरी भक्ति और प्रेम व्यक्त किया गया है कि भक्त कहता है—“राम बिना मोरा जीवन सूना, कैसे जियूँ बिन राम।”
दोहा भगवान श्रीराम की सर्वव्यापकता का सुंदर वर्णन करता है। भक्त के लिए राम केवल किसी स्थान पर विराजमान भगवान नहीं हैं, बल्कि उसके तन, मन और रोम-रोम में बसे हुए हैं।
भजन में राम, लक्ष्मण और सीता के वन जाने तथा राजा दशरथ के सुरधाम जाने का प्रसंग आता है। राम के वनवास के कारण अयोध्या का वातावरण दुख से भर जाता है। कैकेयी की कुटिल बुद्धि और उसके निर्णय को भी इस प्रसंग में दुख का कारण बताया गया है।
आगे कहा गया है कि देवता, मनुष्य और मुनि सभी इस घटना के लिए दोष देते हैं और इसे उचित कार्य नहीं मानते। तुलसीदास जी भगवान के चरणों में अपनी आशा रखते हैं और कहते हैं कि जैसे विधाता उनके प्रतिकूल हो गए हों।
भजन का मूल भाव श्रीराम के प्रति अनन्य प्रेम, विरह, समर्पण और अटूट भक्ति है। इसमें यह संदेश मिलता है कि सच्चे भक्त के लिए भगवान श्रीराम ही जीवन का आधार हैं।