है नीको मेरो देवता कोसलपति राम भजन लिरिक्स
है नीको मेरो देवता कोसलपति राम भजन लिरिक्स
है नीको मेरो देवता
कोशलपति राम
सुभग सरोरुह लोचन
सुठि सुंदर श्याम
सिय समेत सोहत सदा
छबि अमित अनंग
भुज विशाल सर धनु धरे
कटि चारु निषंग
बलिपूजा चाहत नहीं
चाहत एक प्रीति
सुमिरत ही मानै भलो
पावन सब रीति
देहि सकल सुख दुख दहै
आरत जन बंधु
गुन गहि अघ औगुन हरै
अस करुणा सिंधु
देस काल पुरान सदा
बद वेद पुरान
सबको प्रभु सब में बसै
सबकी गति जान
को करि कोटिक कामना
पूजै बहु देव
तुलसीदास तेहि सेइये
शंकर जेहि सेव
है नीको मेरो देवता
कोशलपति राम
सुभग सरोरुह लोचन
सुठि सुंदर श्याम
FAQ
प्रश्न 1: “है नीको मेरो देवता” भजन में किसकी स्तुति की गई है?
उत्तर: इस भजन में भगवान श्रीराम की स्तुति और उनके दिव्य स्वरूप का वर्णन किया गया है।
प्रश्न 2: भगवान श्रीराम को “कोशलपति” क्यों कहा गया है?
उत्तर: भगवान श्रीराम को कोशलपति इसलिए कहा गया है क्योंकि वे कोशल राज्य के राजा थे।
प्रश्न 3: भजन में भगवान श्रीराम के स्वरूप का वर्णन कैसे किया गया है?
उत्तर: भगवान श्रीराम को सुंदर श्याम वर्ण, कमल के समान नेत्रों वाले और धनुष-बाण धारण करने वाले दिव्य स्वरूप में वर्णित किया गया है।
प्रश्न 4: भगवान श्रीराम क्या चाहते हैं?
उत्तर: भजन के अनुसार भगवान श्रीराम को धन-दौलत या केवल बाहरी पूजा नहीं, बल्कि भक्तों का सच्चा प्रेम और भक्ति प्रिय है।
प्रश्न 5: तुलसीदास जी किसकी सेवा करने की बात कहते हैं?
उत्तर: तुलसीदास जी भगवान श्रीराम की सेवा और भक्ति करने की बात कहते हैं, जिनकी स्वयं भगवान शंकर भी सेवा करते हैं।
व्याख्या
इस भजन में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान श्रीराम के सुंदर स्वरूप, करुणा और भक्तवत्सल स्वभाव का गुणगान किया है। भगवान श्रीराम को कोशलपति, सुंदर श्याम वर्ण वाले और कमल के समान नेत्रों वाले प्रभु के रूप में स्मरण किया गया है।
भजन में बताया गया है कि भगवान श्रीराम धनुष-बाण धारण किए हुए अत्यंत सुंदर दिखाई देते हैं। वे अपने भक्तों से किसी प्रकार की भौतिक बलि या दिखावे की पूजा नहीं चाहते, बल्कि उनके हृदय का सच्चा प्रेम चाहते हैं।
जो व्यक्ति भगवान श्रीराम का सुमिरन करता है, उसके जीवन के दुख दूर होते हैं। प्रभु दुखी और पीड़ित लोगों के सच्चे बंधु हैं। वे भक्तों के दोष और पापों को दूर करने वाले तथा अत्यंत करुणामय हैं।
भगवान श्रीराम देश, काल और समस्त वेद-पुराणों के ज्ञाता हैं। वे सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं और प्रत्येक जीव की गति तथा उसके मन की बात जानते हैं।
अंत में तुलसीदास जी कहते हैं कि मनुष्य को अनेक देवताओं से अनेक प्रकार की कामनाएँ करने के बजाय भगवान श्रीराम की भक्ति और सेवा करनी चाहिए, जिनकी सेवा स्वयं भगवान शंकर भी करते हैं। यह भजन सच्चे प्रेम, भक्ति, समर्पण और भगवान श्रीराम के नाम-स्मरण का सुंदर संदेश देता है।