आया तेरी शरण में यही सोचकर भजन लिरिक्स
आया तेरी शरण में यही सोचकर भजन लिरिक्स
आया तेरी शरण में यही सोचकर
सिंधु संसार से हम उबर जाएंगे
आपने गर हमें नाथ ठुकरा दिया
आप ही सोचिये हम किधर जाएंगे।
आपका नाम मोती है लेकर उसे
प्रेम के तार में गूंथता रह गया
आपने अपनी नज़रें अगर फेर ली
सारे मोती जमीं पर बिखर जाएंगे
आया तेरीं शरण में यही सोचकर।
देखता हूँ सदा आपको पास में
आप ही ही है बसे मेरी हर साँस में
आप ही तो मसीहा अनाथों के है
हमको ठुकराए तो किसके घर जाएंगे
आया तेरीं शरण में यही सोचकर।
गलतियां हम किये होंगे इंसान है
माफ करना प्रभु आपका काम है
हम हैं ‘राही’ भटकते रहे उम्रभर
साथ दे दो तो शायद सुधर जाएंगे
आया तेरी शरण में यही सोचकर।
आया तेरी शरण में यही सोचकर
सिंधु संसार से हम उबर जाएंगे
आपने गर हमें नाथ ठुकरा दिया
आप ही सोचिये हम किधर जाएंगे।
FAQ
प्रश्न 1: “आया तेरी शरण में यही सोचकर” भजन का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर: इस भजन का मुख्य भाव भगवान की शरण में पूर्ण समर्पण, विश्वास और क्षमा की प्रार्थना है।
प्रश्न 2: भक्त भगवान की शरण में क्यों आया है?
उत्तर: भक्त संसार रूपी सिंधु से पार होने और जीवन के दुखों से उबरने के लिए भगवान की शरण में आया है।
प्रश्न 3: भक्त भगवान से क्या प्रार्थना करता है?
उत्तर: भक्त भगवान से उसे न ठुकराने, अपनी कृपा बनाए रखने और उसकी गलतियों को क्षमा करने की प्रार्थना करता है।
प्रश्न 4: भजन में “नाम मोती” का क्या अर्थ है?
उत्तर: भगवान के नाम को मोती के समान अनमोल बताया गया है, जिसे भक्त प्रेम के धागे में पिरोकर अपने जीवन में धारण करना चाहता है।
प्रश्न 5: भजन में “राही” कौन है?
उत्तर: “राही” स्वयं को भटकता हुआ भक्त मानकर भगवान से अपने जीवन में साथ देने और सही मार्ग दिखाने की प्रार्थना करता है।
व्याख्या
“आया तेरी शरण में यही सोचकर” एक भावपूर्ण भजन है, जिसमें भक्त भगवान के चरणों में पूर्ण समर्पण करते हुए उनसे अपनी रक्षा और कृपा की प्रार्थना करता है। भक्त को विश्वास है कि प्रभु की शरण में आने से वह संसार रूपी सागर से पार हो जाएगा।
भजन में भगवान के नाम को मोती के समान अनमोल बताया गया है। भक्त प्रेम के धागे में इन मोतियों को पिरोता रहता है और प्रार्थना करता है कि भगवान उससे अपनी दृष्टि न फेरें, क्योंकि प्रभु की कृपा के बिना उसके जीवन का आधार बिखर जाएगा।
भक्त भगवान को अपने जीवन की प्रत्येक साँस में अनुभव करता है और उन्हें अनाथों का मसीहा मानता है। वह कहता है कि यदि प्रभु ही उसे ठुकरा देंगे, तो वह किसकी शरण में जाएगा।
अंत में भक्त अपनी मानवीय गलतियों को स्वीकार करता है और भगवान से क्षमा माँगता है। वह स्वयं को जीवनभर भटकता हुआ “राही” बताकर प्रभु से साथ देने की विनती करता है। भजन का मूल भाव शरणागति, पश्चाताप, विश्वास, क्षमा और भगवान की कृपा की याचना है।